एक ओंकार सतनाम श्री वाहेगुरु
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एक ओंकार सतनाम श्री वाहेगुरु एक सिख भक्ति-वाक्य है, हिन्दू मंत्र नहीं। सिख धर्म एक अलग, स्वतंत्र धर्म है, जो गुरु नानक और उनके बाद आए नौ गुरुओं की शिक्षाओं पर आधारित है, और यह ईश्वर को निराकार, मूर्ति-रहित और एकमात्र मानता है। यह वाक्य उन तीन शब्दों को एक साथ लाता है जिनसे सिख उस एक ईश्वर की बात करते हैं और उसे पुकारते हैं।
उद्गम और स्रोत
वाक्य की शुरुआत एक ओंकार और सतनाम से होती है — ये मूल मंतर के पहले दो शब्द हैं। मूल मंतर वह आधारभूत बाणी है जिससे सिखों के केंद्रीय ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब, का आरंभ होता है। मूल मंतर स्वयं इक ओंकार सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि से शुरू होता है — “ईश्वर एक है, सत्य उसका नाम है, वह कर्ता है, भय-रहित, वैर-रहित, कालातीत स्वरूप वाला, जन्म से परे, स्वयंभू, गुरु की कृपा से जाना जाने वाला” — और आगे बढ़ता है; उसमें वाहेगुरु या “श्री” शब्द कहीं नहीं आता।
इस पेज के वाक्य को एक छोटे भक्ति-रूप की तरह समझना सबसे ठीक है, जो मूल मंतर के पहले दो शब्दों की प्रतिध्वनि है और उन्हें श्री वाहेगुरु से जोड़ता है — वाहेगुरु, वह नाम जो सिख अभिवादन, अरदास और नाम सिमरन में सबसे अधिक प्रयोग होता है, आदरपूर्वक पुकारने का एक ढंग। इससे मिलती-जुलती शब्दावली — इक ओंकार सतनाम श्री वाहेगुरु — गुरु ग्रंथ साहिब के बाहर भक्ति-पाठ के संदर्भों में मिलती है। इसे सिख ग्रंथ का शब्दशः उद्धरण नहीं मानना चाहिए; यह ईश्वर को संबोधित करने वाले आधारभूत शब्दों का भक्ति-संयोजन है, अपने-आप में कोई ग्रंथ-पंक्ति नहीं।
पूरा मूल मंतर
इस पेज का वाक्य अपने पहले दो शब्द मूल मंतर से लेता है, इसलिए पूरी बाणी यहाँ उसी लिपि में दी गई है जिसमें वह लिखी गई है, फिर देवनागरी में, और फिर लिप्यंतरण में। यह वही पाठ है जिससे गुरु ग्रंथ साहिब (अंग 1) आरंभ होता है — किसी रिकॉर्डिंग के बोल नहीं।
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
इक ओंकार सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
ik oṅkār sati nāmu kartā purakhu nirbhau nirvairu akāl mūrati ajūnī saibhaṅ gur prasādi ॥
पंक्ति-दर-पंक्ति, जैसा आम तौर पर समझाया जाता है:
- ੴ (इक ओंकार) — ईश्वर एक है, सबका एक ही कर्ता।
- ਸਤਿ ਨਾਮੁ (सत नाम) — सत्य ही नाम है।
- ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ (करता पुरख) — कर्ता, करने वाला, सृष्टि में उपस्थित।
- ਨਿਰਭਉ (निरभउ) — भय से रहित।
- ਨਿਰਵੈਰੁ (निरवैर) — वैर से रहित।
- ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ (अकाल मूरत) — कालातीत स्वरूप, मृत्यु से परे।
- ਅਜੂਨੀ (अजूनी) — अजन्मा, जन्म-चक्र से परे।
- ਸੈਭੰ (सैभं) — स्वयंभू, स्वयं-प्रकाशित।
- ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ (गुर प्रसाद) — गुरु की कृपा से जाना जाने वाला।
सिख परंपरा मूल मंतर को पूरे गुरु ग्रंथ साहिब की जड़ मानती है: इसके बाद आने वाला जपजी साहिब, और पूरा ग्रंथ, इसी के विस्तार के रूप में पढ़े जाते हैं। अलग-अलग शब्दों के अनुवाद अनुवादकों में भिन्न होते हैं — करता पुरख को “सृजनकर्ता पुरुष” या “रचनात्मक सत्ता,” सैभं को “स्वयंभू” या “स्वयं-प्रकट” — और ऊपर दिए अर्थ सबसे प्रचलित व्याख्याओं का अनुसरण करते हैं, इन भेदों को तय करने का दावा नहीं करते।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
"एक" — ईश्वर एक है, उसका कोई दूसरा नहीं
| शब्द | IAST | अर्थ |
|---|---|---|
| एक | ek | "एक" — ईश्वर एक है, उसका कोई दूसरा नहीं |
| ओंकार | oṅkār | ओंकार — वह एक सर्वव्यापी कर्ता, जिसे गुरमुखी में गुरु ग्रंथ साहिब के आरंभ में ੴ चिह्न से दर्शाया गया है |
| सतनाम | satnām | "नाम सत्य है" — ईश्वर का नाम स्वयं सत्य है |
| श्री | śrī | आदर-सूचक उपसर्ग, यहाँ वाहेगुरु से पहले रखा गया |
| वाहेगुरु | vāhegurū | वाहेगुरु — "अद्भुत प्रभु/गुरु," वह नाम जिससे सिख ईश्वर को सबसे अधिक पुकारते हैं |
पूरे वाक्य का अर्थ
एक साथ पढ़ने पर यह वाक्य ईश्वर के बारे में एक कथन से ईश्वर को संबोधन की ओर बढ़ता है। एक ओंकार और सतनाम घोषित करते हैं कि ईश्वर कौन है: एक, और सब नामों से परे सत्य। फिर श्री वाहेगुरु उसी ईश्वर से सीधे बात करने की ओर मुड़ता है, उस नाम से जिसे सिख रोज़ के जीवन में — अभिवादन में, अरदास में, और मौन स्मरण में — सबसे अधिक पुकारते हैं। यह वाक्य किसी रूप या गुणों वाले देवता का वर्णन नहीं करता; यह एकत्व और सत्य की पुष्टि करता है, और फिर उस एकत्व को नाम लेकर पुकारता है।
इसका पाठ कैसे होता है
इस वाक्य का प्रयोग भक्ति में होता है: इसे स्मरण की अभिव्यक्ति के रूप में बोला या गाया जाता है, और किसी निश्चित विधि से इसकी गिनती नहीं की जाती। वाहेगुरु स्वयं वह नाम है जो सिख नाम सिमरन — ईश्वर के नाम को याद करने की साधना — में सबसे अधिक दोहराया जाता है, चाहे औपचारिक ध्यान में हो या दिन भर सहज रूप से।